सनबर्न से होने वाली खुजली से कैसे बचे




       अल्ट्रावायलेट किरणों के बहुत एक्सपोजर होने की वजह गर्मी के दिनों में अक्सर हमारी त्वचा लाल हो जाती है और खुजली होने लगती है अगर आपको बाहर जाकर काम करना ही है तो कोशिश करें वह सुबह या शाम को निपटा ले भरी दुपहरी में ना निकलें सनबर्न होने के कारण त्वचा में दर्द भी हो सकता है या त्वचा सनस्क्रीन लोशन के प्रति बहुत संवेदनशील हो जाए तो फुल बाहों वाले कपड़ें पहने अगर कुछ उपाय को ध्यान में रखकर फ़ॉलो करें तो कुछ राहत मिल सकती है

धूप में निकलने से पहले 3 गिलास पानी - हाइड्रेट रहने के लिए गर्मी के दिन में तरल चीजों का सेवन ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए क्योंकि इन दिनों शरीर को पानी बहुत जरूरत होती है जब भी आपको धूप में बाहर जाना है तो घर से निकलने से पहले 3 गिलास पानी जरुर रख ले नमक का सेवन करें मगर कम करें

बारबेक्यू के फ़ूड आइटम लेने से बचे - इन दिनों मौसमी फलों और दही का सेवन करना चाहिए बारबेक्यू के फ़ूड से बचना चाहिए उनसे पेट खराब हो सकता है अगर जी मचलने , चक्कर आने , थकान हो तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए

ठंडक के लिए 2 बार शावर ले - शरीर को ठंडा रखने के लिए इन दिनों दो बार नहाए पीने के लिए हमेशा अपने पास पानी की बोतल रखे

सनस्क्रीन और कूल कम्प्रेस - तेज धूप में झुलसने से बचने के लिए धूप में निकलने से 20 मिनिट पहले 30 एसपीएफ या उससे ज्यादा वाला सनस्क्रीन लोशन लगाएं एक ठंडा गीला टॉवेल सनबर्न से बहुत आराम दे सकता है और खुजली को कम कर सकता है

माँइस्चराइजर का प्रयोग करे - सनबर्न हो जाने पर त्वचा में खिचाव महसूस हो सकता है वो सूखी और खुजली वाली हो जाती है गर्मियों की ऊष्मा इस स्थिति को और खराब कर देती ऐ त्वचा को हाइड्रेट रखने के लिए विटामिन सी और ई वाला माँइस्चराइजर का प्रयोग करे

एलोवेरा का प्रयोग - एलोवेरा सनबर्न का सबसे पारम्परिक उपचार है एलोवेरा के रस या जेल का प्रयोग करे इसमें खुशबू नही मिलाएं इससे त्वचा में जलन हो सकती है

करें डॉक्टर से तुरंत सम्पर्क -  अगर सनबर्न हो जाने पर बुखार आ गया हो शरीर की 20 % त्वचा पर फफोले आ गए हो चक्कर आ रहे हो तो डिहाइड्रेशन हो सकता है ऐसी स्थति में तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए
दूध में रूई के फाहे भिगोकर रखे - त्वचा जहां - जहां झुलसी हो वहां ठंडे दूध में भिगोकर रूई के फाहे रखें लेकिन ध्यान रखें दूध ज्यादा ठंडा ना हो और झुलसी हुई जगह पर परफ्यूम और साबुन ना लगाएं

नहाने के पानी में खाने का सोडा मिलाएं - नहाने के पानी में एक कप एप्पल सिडर विनेगर मिला लें ताकि त्वचा का पीएच संतुलन बनाने में मदद मिल सके और त्वचा हील हो सके नहाने के पानी में एक कप एप्पल सिडर विनेगर मिला लें ताकि त्वचा का पीएच संतुलन बनाने में मदद मिल सके और त्वचा हील हो सके

हल्दी , पुदीन और खीरे का पेस्ट - खीरे में एंटी ऑक्सीदेंतेस होते है दर्द निवारक के गुण होते है इसकी वजह से यह सनबर्न होने आराम पहुंचाता है ठंडे खीरे को मैश करे और पेस्ट को जली हुई जगह पर लगाएं सनबर्न से प्रभावित क्षेत्र पर हल्दी ,पुदीने और दही का मिश्रण लगाने से भी त्वचा को आराम मिलता है



तेनू काला चश्मा जचदा ऐ

सनग्लास पहनना हर किसी को पसंद होता है क्योंकि यह धूप , धूल से हमारी आंखों को बचाता है ।

आपको काला चश्मा पहनना है तो कुछ बातें जरूर याद रखे

1हमेशा चश्मा खरीदते समय यह ध्यान रखें कि जो भी शेड का आप खरीद रहे हो वह सूरज की किरणों से आपकी आंखों को पूरी सुरक्षा देंगे या नहीं ।

2 लेंस का रंग कैसा है यह भी जरूर ध्यान दे आपके लेंस का रंग चाहे ग्रे , ब्लू , ब्लैक या किसी भी रँग का हो वह प्रोटेक्ट फैक्टर पर कोई असर नहीं डालना चाहिए ।

3 स्क्रेच सही है ऐसा नहीं है अगर आपके शेड्स में स्क्रेच है तो आप देखने के लिए अपनी आंखों पर ज्यादा जोर देते हैं ऐसा करने से आंखों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है ।

4 आप अक्सर यह सोचते हैं कि सनग्लास के साइज से कोई फर्क नहीं पड़ता तो आप गलत सोचते हैं एक्सपर्ट कहते हैं कि बड़े लेंस वाले शेड्स अच्छे होते हैं क्योंकि वो रोशनी को आंखों में जाने नहीं देते हैं ।

5 लो क्वालिटी के नहीं बल्कि अच्छी क्वालिटी के ही सनग्लासेस खरीदना चाहिए ।

जो भी सनग्लास खरीदे आप उससे अच्छी तरह देख सके मजबूत हो औऱ आंखों को नुकसान नहीं पहुँचाए ।

आज के दिन चिपको आन्दोलन की शुरुआत

     
       जब कभी भी हम पर्यावरण संरक्षण की बात करते है तो दिमाग़ में आता है उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में ८० के दशक में चले चिपको आन्दोलन के बारे में आज 26 मार्च के ही दिन चिपको आन्दोलन किया गया था वनों को संरक्षित करने के लिए इस अनूठे आन्दोलन की वजह से आज देशभर में पर्यावरण के प्रति जागरूकता फ़ैल गई है यह आन्दोलन पर्यावरण व् प्रकृति की रक्षा के लिए चलने वाली प्रक्रिया है ।

क्या है चिपको आन्दोलन की कहानी 

भारत में पहली बार 1927 में वन अधिनियम 1927 को लागू किया गया था इस अधिनियम के कई प्रावधान आदिवासी और जंगलो में रहने वाले लोगों कि हितों के खिलाफ़ थे । ऐसी ही नीतियों के खिलाफ़ १९३० में टिहरी में एक बड़ी रैली का आयोजन किया गया अधिनियम के कई प्रावधानों के खिलाफ़ जो विरोध १९३० में शुरू हुआ था वह 1970 में एक बड़े आन्दोलन के रूप में सबके सामने आया जिसका नाम चिपको आन्दोलन रखा गया । 1970 से पहले महात्मा गांधी के एक शिष्य सरला बेन ने १९६१ में एक अभियान की शुरुआत की जिसके तहत उनहोंने लोगों को जागरूक करना शुरू किया । 30 मई १९६८ में बड़ी संख्या में आदिवासी पुरुष और महिलाएं पर्यावरण संरक्षण के मुहीम के साठ जुड़ गए । इस प्रकार आगे चलकर इन्ही छोटे - छोटे आंदोलनों से मिलकर विश्वव्यापी जनांदोलन की शुरुआत हुई ।

चिपको आन्दोलन की शुरुआत 

१९७४ में वन विभाग ने जोशीमठ के रैनी गाँव के करीब ६८० हेक्टेयर जंगल ऋषिकेश के एक ठेकेदार को नीलाम कर दिया । इसके अंतर्गत जनवरी १९७४ में रैनी गाँव के २४५९ पेड़ों को चिन्हीत किया गया । 23 मार्च को रैनी गाँव में पेड़ो का काटन किये जाने के विरोध में गोपेश्वर में एक रैली का आयोजन हुआ , जिसमें गौरा देवी ने महिलाओं का नेतृत्व किया ।

प्रशासन ने सड़क निर्माण के दौरान हुई क्षति का मुआवजा देने की तिथि 26 मार्च टी की गई जिसे लेने के लिए सभी को चमोली आना था । इसी बीच वन विभाग ने सुनियोजित चाल के तहत जंगल काटने के लिए ठेकेदारों को निर्देशित कर दिया कि 26 मार्च को गाँव के मर्द चमोली में रहेंगे और सामाजिक कार्यकर्ताओं को वार्ता के बहाने गोपेश्वर बुला लिया जाएगा और आप मजदूरों को लेकर चुपचाप रैनी की और चल पड़े और पेड़ों को काट डालो इसी योजना पर अम्ल करते हुए श्रमिक रैनी की और चल पड़े । इस हलचल को एक लड़की द्वारा देख लिया गया और उसने तुरंत इससे गौरा देवी को अवगत कराया पारिवारिक संकट झेलने वाली गौरा देवी पर आज एक सामूहिक उतरदायित्व आ पड़ा गाँव में उपस्थित 21 महिलाओं और कुछ बच्चों को लेकर वह जंगल की और चल पड़ी । ठेकेदार और जंगलात के आदमी उन्हें डराने धमकाने लगे लेकिन अपने स्साहस का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने डटकर सामना किया और उन्होंने गाँव की महिलाओं को गोलबंद किया और पेड़ों से चिपक गए ठेकेदार व् मजदूरों को इस विरोध का अंदाज न था जब सैकड़ो की तादाद में उन्होंने महिलाओं को पेड़ों से चिपके देखा तो उनके होश उड़ गए उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा ओरिस तरह यह विरोध चलता रहा ।

उस समय अलकनंदा घाटी से उभरा चिपको का संदेश जल्दी ही दोसोरे इलाकों में भी फ़ैल गया नैनीताल और अल्मोड़ा में आन्दोलनकारियों ने जगह - जगह हो रहे जंगल की नीलामी को रोका ।

टिहरी से ये आन्दोलन सुन्दरलाल बहुगुणा के द्वारा शुरू किया गया जिसमें उन्होंने गाँव -गाँव जाकर लोगो में जागरूकता लाने के लिए १९८१ से १९८३ तक लगभग 5000 कि. मी लम्बी ट्रांस - हिमालय पदयात्रा की । और १९८१ में हिमालयी क्षेत्रों में एक हज़ार मीटर से ऊपर के जंगल में कटाई पर पूरी पाबंदी की मांग लेकर आमरण अनशन पर बैठे इसी तरह से कुमाऊं और गढ़वाल के विभिन्न इलाकों में अलग - अलग समय पर चिपको की तर्ज पर आन्दोलन होते रहे ।

अंतत: सरकार ने एक समिति बनाई जिसकी सिफारिश पर इस क्षेत्र में जंगल काटने पे 20 सालों के लिए पाबंदी लगा दी गई ।

आन्दोलन का प्रभाव 

इस आन्दोलन की मुख्य उपलब्धि ये रही कि इसने केन्द्रीय राजनीति के एजेंडे में पर्यावरण को एक सघन मुद्दा बना दिया जैसा कि चिपको के नेता रहे कुमाऊं यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ शेखर पाठक कहते है '' १९८० का वन संरक्षन अधिनियम और यहाँ तक कि केंद्र सरकार में पर्यावरण मंत्रालय का गठन भी चिपको की वजह से ही सम्भव हो पाया .''

उत्तर प्रदेश में इस आन्दोलन ने १९८० में तब एक बड़ी जीत हासिल की जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने प्रदेश के हिमालयी वनों में वृक्षों की कटाई पर 15 वर्षो के लिए रोक लगा दी बाद के वर्षो में यह आन्दोलन पूर्व में बिहार , पश्चिम में राजस्थान , उत्तर में हिमाचल प्रदेश , दक्षिण में कर्नाटक और मध्य भारत में विंध्य पर्वतमाला में वृक्षों ली कटाई को रोकने में सफल रहा साथ ही यह लोगों की आवश्यकताओं और पर्यावरण के प्रति अधिक सचेत प्राकृतिक संसाधन नीति के लिए दबाब बनाने में भी सफल रहा l


नोट 

चिपको आन्दोलन के सूत्रधार श्रीमती गौरा देवी थी l

इस आन्दोलन को शिखर तक पहुँचाने का काम पर्यारवरणविद सुन्दरलाल बहुगुणा ने किए l

सं १९८१ में सुन्दरलाल बहुगुणा को पद्मश्री पुरस्कार दिया गया लेकिन उन्होंने स्वीकार नही किया कि क्योंकि उन्होंने कहा जब तक पेड़ों की कटाई जारी मैं अपने को इस समान के योग्य नहीं समझता हूँ ।

इस आन्दोलन को १९८७ में सम्यक जीविका पुरस्कार ( Livelihood Award से सम्मानित किया गया ।

जिस तरह से इन लोगों ने एक आंदोलन के माध्यम से वनों को काटने से रोका उसी तरह हमें भी अपने पेड़ पौधों, वनों को बचाना चाहिए । एक दिन कहीं ऐसा ना आ जाए कि धरती पर पेड़ ही ना बचे फिर बिना पेड़ो का जीवन कैसा होगा यह तो सोचा ही जा सकता है । इसलिए पेड़ो को बचाइए और हरियाली के बीच अपना जीवन अच्छे से बिताइए । 

स्ट्रीट फ़ूड नूडल्स फ्रंकी



सामग्री: 1 कप नूडल्स (उबले हुए), आधा-आधा प्याज़ और शिमला मिर्च, 1/4 कप पत्तागोभी (तीनों बारीक़ कटे हुए), नमक स्वादानुसार, रेड चटनी और शेज़वान सॉस (बाज़ार में उपलब्ध)- दोनों स्वादानुसार, 2 टेबलस्पून उबले हुए आलू की सब्ज़ी, 1/4 कप चीज़ (कद्दूकस किया हुआ), बटर आवश्यकतानुसार.


विधि: पैन में बटर पिघलाकर प्याज़, शिमला मिर्च और पत्तागोभी डालकर नरम होने तक भून लें. उबले नूडल्स और नमक डालकर 1-2 मिनट तक भून लें. रेड चटनी डालकर अच्छी तरह मिक्स करें. आंच से उतारकर अलग रखें. फ्रेंकी पर शेज़वान सॉस लगाकर आलू की सब्ज़ी फैलाएं. नूडल्स वाला मिश्रण डालकर ऊपर से शेज़वान सॉस डालें. कद्दूकस किया चीज़ बुरककर फ्रेंकी को रोल करें. बटर लगाकर गरम तवे पर सुनहरा होने तक सेंक लें. गरम-गरम सर्व करें.


फ्रेंकी बनाने के लिए: आधा कप मैदा, आधा टीस्पून तेल, चुटकीभर नमक और आवश्यकतानुसार पानी मिलाकर नरम गूंध लें. 5 मिनट तक ढंककर रखें. लोई लेकर पतली रोटी बेलें. गरम तवे पर तेल लगाकर हल्का-सा सेक लें.


मोह नीलू के प्रेम के बंधन की कहानी

     
       मेरा नाम नीलिमा विश्वकर्मा है मेरा घर भोपाल में है पर मैं घर से दूर जबलपुर के एक कॉलेज में बी एस एस सी की पढ़ाई की उसके बाद अब यही जबलपुर की कंपनी में काम करती हूँ । हम एक फ्लैट में हम दो लड़कियां मिलकर रहती है एक ही कॉलेज में थे और अब एक ही कम्पनी में साथ में काम करते हैं । कॉलेज के शुरुआती दौर में हम दोनों होस्टल में रहते थे पर वहां का वातावरण पसंद नहीं आया वार्डन के झिकझिक से परेशान होकर हमने एक फ्लैट ले लिया अब उसी में रहते है दोनों मिलकर खाना बनाते हैं खाते हैं एक साथ रहते हैं पहले साथ में एडजस्ट नहीं हो पाते थे कुछ परेशानियां होती है पर अब सब ठीक है ।

       हमने एक रूम में ही दो बेड ज़मीन पर लगाए हैं , कभी कभी ऑफिस की कुछ सहेलियां साथ में रहने आ जाती है तो नीचे रहने वालों के पास से गद्दे ले आते हैं कमरे में एक टेबल है जिस पर बारी बारी से हम काम करते हैं , दो अलमारी है जिसमें हम अपने कपडे औऱ जरूरत का सामान रखते हैं । एक छोटा सा किचन है जहां हम दोनों खाना बनाते हैं । ऑफिस जाने का का टाइम सुबह नौ बजे है घर पर ही दोनों नाश्ता बना लेते हैं लंच ऑफिस में औऱ फिर रात को आकर खाना बनाते हैं फिर लैपटॉप पर मूवी देखते हुए सो जाते हैं यही हमारी दिनचर्या है ।

          मेरे घर पर मम्मी पापा व पापा बैंक में थे अभी रिटायर हो गए और मम्मी स्कूल में पढ़ाती है । घर से निकले हुए अभी काफी वक़्त बीत गया है छुट्टियों में मिलने जाया करती हूँ पर छुट्टियों में भी बहुत से काम होते हैं सो 3 - 4 महीनों से घर पर जाना नहीं हुआ है बस फोन पर बात हो जाती है । यहां बहुत सी सहेलियां बन गई है जो यही जबलपुर में रहती है उनसे बस छुट्टियों के दिन ही मिलना हो पाता है बाकी दिन घर से ऑफिस फिर ऑफिस से घर यही मेरी छोटी सी दुनिया है ।

       कहते हैं एक सामान्य सी चलती जिंदगी में ही कुछ खास हलचलें होनी जरूरी होती है बस मेरी सामान्य सी ज़िन्दगी में भी हलचलें शुरू होने ही वाली थी ये आने वाले प्रेमी की हलचलें थीं जिसके आ जाने से जीवन में प्रेम आने वाला था और अकेलापन दूर होकर जिंदगी में नया उत्साह शुरू होने वाला था एक नया जीवनसाथी जो मिलने वाला था ।

      औऱ एक दिन कम्पनी से ट्रेनिंग देने ही जाना था सोचा चलो बहुत वक़्त से घर जाना नहीं हुआ है इसी बहाने मिलना हो जाएगा पर फिर पता चला ट्रेनिंग सेंटर और घर की दूरी ज्यादा थी औऱ रुकने का सारा इंतजाम वहीं था इसलिए सोचा जब ट्रेनिंग खत्म हो जाएगी तो एक दिन रहकर आ जाउंगी ।

      ट्रेनिंग के दौरान ही उस अजनबी मोह शर्मा से मुलाकात हुई शुरुआत में कुछ नॉर्मल से ही बातें हुई थी जैसे पसंद नापसंद, पढ़ाई, काम , घरवालों के बारे में, जिम्मेदारियो के बारे में बस इतनी ही बातें हुई मोह का स्वभाव बहुत गजब का लगा सीधे सिंपल , सबसे हंसकर बाते करना, सबको पूछना इज्ज़त देना, आगे बढ़कर काम करना , इंटेलिजेंट , अपनी स्वयं की यूनिक सी पहचान अच्छा लगा मिलना बाते करना उसकी बातों से अजनबीपन नहीं लगा ।

       हम कुछ और बातें करते पर वापस जाने का वक्त हो गया था इसलिए हमने अपने नम्बर एक्सचेंज किये औऱ फिर हम तीनों शाम 4 बजे की ट्रेन से मैं मोह औऱ मेरी सहेली वापस भोपाल के लिए रवाना हो गए मोह को वापस गुजरात जाना था सो वो वहां से दमन चले गए और मैं और भोपाल घर आ गए थे घर आये इतने वक़्त बाद मम्मी पापा से मिलकर अच्छा लगा हमारे आने से दोनों बहुत खुश हो गए थे घर में ज्यादा बदलाव तो नहीं हुए थे फिर भी कुछ कुछ चीजें बदल गई थी । मेरे कमरा अभी भी वैसा ही था जैसा मैं छोड़कर गई थी थोड़ी देर बातें करने के बाद हमने आराम किया फिर मम्मी मैं औऱ प्रीति ने मिलकर खाना बनाया खाते हुए बहुत सारी बातें हुई थकान थीं इसलिए हम सब सो गए ।

       छुट्टी ज्यादा नहीं थीं इसलिए आज ही जबलपुर के लिए निकलना था ताकि कमरे पर जाकर बचे हुए काम निपट जाएंगे फिर अगले दिन से ऑफिस चले जाएंगे सब हमारे काम समझते हैं इसलिए हमें जाने मिल गया । सबको आते है कहकर हम दोनों निकल गए ।  रूम पर पहुँचने के बाद काम निपटाये और फिर रोज ऑफिस औऱ ढेर सारे काम ।

     अब रोज मैं औऱ मोह वॉट्सऐप पर बातें करने लगे थे कहते है किसी लम्बी दूरी तक चलने वाले दो लोगों के मजबूत रिश्ते की शुरुआत होती है धीरे धीरे ही होती है और इंसान के मन की परतें भी हौले हौले ही खुलना शुरू होती है बस कुछ इसी तरह हमारे इस रिश्ते की शुरुआत भी ऐसे ही हो रही थी । वक़्त के बीतने के साथ साथ हम मन से ज्यादा करीब आने लगे एक दूसरे के लिए प्यार , अपनापन , फिक्र , एक दूसरे के लिए एक अटूट विश्वास इन सभी चीज़ो ने जगह बना ली थी हम एक दूसरे से बहुत प्यार करने जानने ,समझने, पहचानने लगे थे । हमने यह तय कर लिया था कि कुछ दिनों में हम शादी कर लेंगे उनके घर में मम्मी पापा औऱ मोह के अलावा दो भाई और थे छोटा सा परिवार और मैं सबको ही पसंद थी औऱ मेरे घर पर भी मोह सबको पसंद थे ।

       कुछ दिन बीत गए बातें तो रोज ही होती थी दूर बैठकर भी हम अपना प्यार मेसेजेस , फोटोज़, स्माइल्स से
भेजते ,दमन (गुजरात) से जबलपुर दूर तो था मगर मिलने की छुट्टी नहीं मिल रही थी , काम का प्रेशर , थकान खाना बनाना यही सब हमारी दिनचर्या थी हमारे बीच अच्छी समझ बन चुकी थी हम एक दूसरे के तनाव औऱ मन की बातों को अब अच्छी तरह समझने लगे थे ।

         मुश्किल से मेरे जन्मदिन पर हम मिले परिवार के बीच प्यार की छोटी सी मुलाकातों में ढेर सारे सपने देखे एक दूसरे के साथ वक्त बिताया ये मोह का इतनी दूरी तय करके आना मेरे लिए एक तोहफा था प्यार का , हम दो बार मिले एक बार जन्मदिन पर औऱ एक बार मोह के घर पर सबसे मिलना हुआ अपनों के प्यार का अपनापन मिला , कुछ पल प्यार के बिताए जो तस्वीरों और मन मस्तिष्क में कैद हो गए औऱ हमारी छुट्टियां खत्म हो गई एक दूसरे से फिर मिलने के वादे करके हम वापस अपने-अपने शहरों में लौट गए वही ऑफिस फिर वही दिनचर्या ।

       उसके बाद मोह को छुट्टियां ही नहीं मिल रही है कि वो यहां मुझसे मिलने जबलपुर आये। प्यार के सफर में जरूरी नहीं है कि आप पास ही हो कभी कभी दूर रहकर एक दूसरे के करीब आ जाते हैं यही हमारे रिश्ते में हो रहा था । इस बीच हम फिर नहीं मिल पाए ज्यादा समय बस चैट औऱ फोन पर ही बातें हुई है। अब रिश्ते में अपनापन , मिलने की चाहत, ज्यादा बढ़ जा रहा था ।

       बार - बार फोन पर चैट पर एक बात होती छुट्टी नहीं मिल रही नहीं मुझे ना मोह को एक अजीब सी उलझनों में हम फंसे हुए थे सारे रिश्तेदार आपस में यही बात करते अरे ये विश्वकर्मा जी कि लड़की का विवाह कब होगा कितने वक़्त से बात पक्की हो गई है औऱ अभी तक नहीं हुआ विवाह भई अब लड़के को छुट्टी मिल जानी चाहिए । देखो अब कब होता है भई अच्छा हो जाए बच्चे खुश रहे  । यही सारी बातें सुनने मिल रही थी ।

     वक्त तो समुंदर की रेत की तरह हाथ से फिसलता जा रहा था और अब तक कुछ नहीं हो रहा था यही सारे तनाव, जिम्मेदारियां , ना मिलने का अफसोस बढ़ रहा था । मैं औऱ मोह जब भी बात करते सिर्फ इतना ही बोल पाते कि अब कुछ होना चाहिए पर वक्त ने तो जैसे हमारी परीक्षा लेने की सोच रखा था । परीक्षा हमारे प्यार की , हमारे इन्तजार की , कदम कदम पर तरह तरह की चुनौतियो के बीच हम एक साथ आगे बढ़ते औऱ बहुत बढ़ते जा रहे थे ।

        रोज मेरी और मेरी सहेली प्रीति रात को बेड पर बैठकर कॉफ़ी पीते हुए इसी बात पर डिसकस करते कि अब कोई नया रास्ता मिलना चाहिए नहीं तो सब चीज़े बुरा मानती जा रही थी । प्रीति भी कहती कि सब्र रखो सब अच्छा होगा मोह को अच्छी जॉब मिलेगी तो सब सही हो जाएगा फिर तुम दोनों जल्दी शादी हो जाएंगी औऱ सबके तनाव खत्म हो जायेंगे । मैं औऱ प्रीति एक साथ सोते थे इसलिए साथ में बाते भी हो जाती थी ऑफिस से थक हारकर आने के बाद खाना बनाना फिर थोड़ी देर बाते मेरी औऱ प्रीति की फिर वही आधी अधूरी नींद ।

         कभी कभी ऑफिस के किसी दोस्त की शादी में जाते या फिर कभी कहीं ऑफिस के कुछ लोग मिलकर बाहर किसी जगह घूमने जाते मगर ना तो मधुर धुन में बजने वाली शादी की शहनाई भा रही थी ना तो कहीं बाहर घूमने का मन होता था सब मित्र मुझसे पूछते कि नीलू तुम क्यों नहीं चलती हो चला करो तनाव से थोड़ी राहत मिलेगी कभी चली जाती कभी ऑफिस के काम में उलझी रह जाती ।

        दिन छोटे औऱ रात लम्बी एक सीधी सीध में बीतती जा रही थी ढेर सारे सपने आँखों में दस्तक दिये जा रहे थे । हमारे बीच एक अजीब सी खामोशी जगह ले रही थी प्यार तो बहुत करते हैं हम पर इस वक़्त कुछ समझ नहीं आ रहा था । मोह बात करते थे पर वही तनाव कुछ नहीं हो रहा है जानू क्या करूँ कुछ समझ नहीं आ रहा है जल्दी सब सही करना चाहता हूं मगर बहुत उलझनें बढ़ गई है मैं भी यही कहती मोह चिंता मत करो मैं हूँ तुम्हारे साथ सब ठीक हो जाएगा । दिमाग में ढेर सारे विचारों चल रहे थे , ना मैं औऱ मोह मिल पा रहे थे छुट्टी ना मिलने औऱ ना मिलने का अफसोस औऱ दुखी कर रहा था । अच्छा वक्त कब आएगा कब आएगा बस इसी अच्छे वक्त के इंतजार में हम मोह नीलू की प्रेम अनोखी प्रेम कहानी आगे बढ़ती जा रही थी ।

        ठंड का मौसम खत्म होकर फाल्गुन का गुलाबी मौसम शुरू हो गया था नई ताज़गी नई हरियाली सब कुछ नया औऱ फरवरी के रविवार की एक सुंदर शाम थी औऱ हमारी छुट्टियां नहीं थीं सो ऑफिस से आने के बाद मोह का फोन आया मीठी मीठी बातें हुईं आज अचानक मौसम बदला तो बारिश हो गई थी मोह की प्यारी प्यारी बातों से मन का मौसम और खुशनुमा हो गया था । मोह ने बताया कि छुट्टियों के लिए बॉस से बात की तो अब मेरी छुट्टियों को भी ग्रीन सिग्नल यानी हरी झंडी मिल गई थी । यानि हमारे मिलन की हरी झंडी ।

        थोड़ी राहत मिली खबर सुनी तो बैठे हुए यूँही सोचने लगी ये मन भी कितना अजीब सा है ज़रा छोटी सी खबर क्या सुनी नए सपने सजाने लगा हमारी मिलने की खुशी के लिए खुश हो गया पर हकीकत यह थीं जब तक मोह यहां मिलने नहीं आ जाए तब तक कोई इन अरमानों का सपनों के खुले आकाश में उड़ान भरने का अर्थ नहीं था मोह नीलू का मिलन ना हो जाए मन की इस सूखी धरती पर राहत वाले खुशियों के फूल नहीं खिलेंगे । उस रात थोड़ी सुकून वाली नींद आई थी एक ओर नई खुशियां नये संसार को बसाने की चाहत औऱ दूसरी ओर अपनी इस दुनिया को बदलकर दुनिया में जाने की बेचैनी, तनाव , ढेर सारी हिचकिचाहट, ये सब अब मुझमें जगह बना रहा था । समझ नहीं आ रहा था सब कैसे होगा इन नए रिश्तों को सम्भहालना अच्छी बेटी ,बहू और पत्नी बनना , सब इस वक़्त समझ से परे थे क्योंकि उस वक़्त के साथ मेरा आने वाला नया कल जुड़ चुका था ।

        दिन फिर बीतने लगे औऱ मोह नीलू के विवाह के मधुर मिलन का वक़्त आने में ना जाने कितना वक़्त लगेगा ।अब हमारे बीच चैट में भी बाते हम होने लगी थी क्योंकि काम का प्रेशर रोज बढ़ता जा रहा था ऐसा लग रहा था कि अब वो वक्त दौड़ लगाकर हमें मिल जाए कि हम साथ बैठकर फुर्सत में कुछ आने वाली ज़िन्दगी के बारे में कुछ बातें कर सके । मोह को जब याद आती फोन आ जाता ।

       हमारे बीच चंद मीलों की दूरियां थीं वक़्त का इम्तिहान था , गहरा प्रेम था , तस्वीरें और आवाजें थीं पर वक़्त जिस तेजी से आगे बढ़ रहा था रिश्ते की शुरुआत में जिस तरह से ये तस्वीरों में एक दूसरे को देखना औऱ आवाज़े सुनकर मन बहल जाता था आज यही सब चीज़े औऱ उदासी बढ़ा रही थी क्योंकि आज जरूरत है कि हम मिले एक दूसरे के साथ बातें करें वक्त बिताए आने वाले जीवन के बारे में साथ बैठकर कुछ बातें करें । वो वक़्त मिलन का वक़्त अब जल्दी आए जब हम सब मिले ।

      मन वो दिन वो मुलाकातें वो बाते याद करने लगा जब हम स्वीटू जानू पहली बार मिले थे मिले हैं तभी तो प्रेम के इस अनोखे बन्धन में बंधने के लिए आगे एक साथ बढ़े है जीवनभर साथ चलने के लिए । जब हमने इस रिश्ते की शुरुआत की थी तब इतनी समझ नहीं थीं हमारे बीच कहते हैं वक़्त दो सब बढ़ जाता है फिर चाहे आप घर के बगीचे के किसी मे गमलें में किसी पौधे का बीच रोप दो खाद दो , पानी दो , ध्यान रखें तो वह भी वक्त आने पर बढ़ ही जाता है ठीक उसी तरह दो लोगों के रिश्ता भी ऐसा ही होता है । वक़्त दो , भरोसा करो , समझो तो बढ़ता जाता है ।

       हमारा रिश्ता एक कहानी की तरह बनता जा रहा था जिसमे उतार चढ़ाव , मुश्किलें , समझदारी , दूरियां औऱ भी बहुत कुछ था इसके लेखक तो हम दोनो ही थे क्योंकि इस रिश्ते के धागों से हम दोनों ही बंधे हुए हैं इसलिए इस कहानी के मुख्य में हम ही थे हमें इंतजार बस उस एक दिन का नहीं था जब मोह मेरे दरवाजे पर बारात लेकर आएंगे और मैं उनकी दुल्हनिया बनकर उनका इंतजार करूँगी बल्कि हमें एक साथ मिलकर एक नई दुनिया की शुरुआत करनी थी इन्हीं दिनों का इंजतार था क्योंकि हमें एक गृहस्थी बसानी थीं घर ओर उसके अलावा कई और जिम्मेदारियां निभानी थी ।

        विवाह मात्र एक दिन की कहानी नहीं है या कुछ रस्मों की मोहताज यह तो एक नई शुरुआत है दो लोगों के पति पत्नी बनने की दो परिवारों के जुड़ने की । मोह लगातार कोशिश कर रहे थे कि किसी तरह नई नौकरी मिल जाए क्योंकि इसी नौकरी से हमारी नये गृहस्थ जीवन का रास्ता जुड़ा हुआ था जितनी जल्दी मिलेगी उतनी जल्दी हम विवाह बंधन में बंध जायेगे इन्ही देरियो औऱ दूरियों में हमारा रिश्ता एक - एक कदम आगे बढ़ रहा था ।

        ये वक़्त ही अजीब है मन को ना जाने कितनी सारी चिंताओ ने घेर रखा था मोह कहते हैं शादी हो जाएगी तो सारे टेंशन खत्म फिर नो टेंशन पर शादी के बाद नए तरह के टेंशन शुरू हो जाएंगे । मन ना जाने क्यों नई आने वाली चीज़ों के लिए तैयार ही नहीं होता है । कुछ घबराहटो ने मेरे मन में ही अपना घर बना लिया था । वक़्त जितनी तेज़ी से रेस के घोड़े की तरह भाग रहा था तनाव रोज उसी गति से बढ़ता जा रहा था । कभी तो यह सोच कर मन खुशी से झूम रहा था कि हमारी शादी होगी मैं दुल्हन बनूँगी फिर कभी तो मन यह सोचकर उदास हो जाता कि ना जाने क्या क्या बदलेगा ज़िंदगी में, कैसे मैं अपने माता पिता से दूर एक अनजानी जगह पर रहूंगी , एक नई ज़िंदगी कैसी होगी , किस तरह ये सारी जिम्मेदारियां सभहाल पाऊंगी , नए रिश्तों को कैसे निभा पाऊंगी एक बेटी बनना तो आसान है लेकिन उसके अलावा अब कई नए रिश्ते मिलने वाले हैं पत्नी ,बहू, भाभी औऱ भी ना जाने कितने । ये सब निभाना किस तरह होगा औऱ कई सवाल मुझे परेशान कर रहे थे । पर इन सभी बातों में सबसे जरूरी था मोह को अच्छी नौकरी मिलना तभी ही इन सभी तनावों से राहत मिलेगी इस नौकरी से ही सभी चीज़े एक डोर के अनेक सिरो से बंधी थीं ।

      हम मोह नीलू को मिले हुए 2 साल हो रहे थे इन्हीं फरवरी के उन खूबसूरत दिन में हम पहली बार मिले थे सोचा नहीं था सब कुछ इतना बढ़ जाएगा वैसे भी वक़्त बीतने पर तो दो लोगों के रिश्ते में मजबूती आ जाती हैं । ये वक़्त ही ऐसा है बस इंजतार है शुरू होने वाली उस जिंदगी की जिसमें हम हमारे परिवार के लिए बहुत कुछ कर पाएं उन्हें खुशियां दे पाएं क्योंकि जीवन का आधा से ज्यादा समय तो इन दूरियों , एक दूसरे के लिए ढेर सारे प्यार , पास होने के अरमान ,एक दूसरे की याद में बीत गया है औऱ हम में जिंदगी की नई डगर पर चलने केे लिए तैयार है ।













जाने कब वो सयानी हो जाती है



विश्व कविता दिवस पर पढ़िए

छुपकर माँ से लिपस्टिक लगाती है
जाने कब वो सयानी हो जाती है
माँ की साड़ी को पहन वो इतराती है
आंचल में सुरमुई सी हो जाती है
माँ की तरह रसोई सम्हालती है
अपने हुनर से वो सयानी हो जाती है
पिता के दुःख में कंधा बन जाती है
दुःख सुख में वो सयानी हो जाती है
पिता की शर्ट देख हमसफर के सपने सजाती है
नई उमंगो में वो सयानी हो जाती है
उम्र की नई ढलानों पर चढ़ती जाती है
जाने कब वो सयानी हो जाती है
सबका मान ध्यान रखती जाती है
सबकी प्यारी रानी  हो जाती है
मन में बजती शहनाई धुन पर सजती है
अपने सपनों में जाने कब बड़ी हो जाती है
दो दो कुलों की लाज बन जाती है
जाने कब वो सयानी हो जाती है
बारीकी से सब सीख नई गृहस्थी बसा लेती है
अपने अनुभवों में जाने कब वो सयानी हो जाती है
पहले पूछकर शर्माती थी ये हमारे क्या लगते है
जाने कब रिश्तों को निभाना सीख जाती है
हाथों में किताबें बस्तें सम्भलती स्कूल जाती है
वो सयानी कब पूरे घर की धुरी बन जाती है
बेटी से बहू पत्नी माँ जाने कितने रिश्तों में ढल जाती है
जाने कब वो सयानी हो जाती है
जाने कब वो सयानी हो जाती है





चित्रदुर्ग सोने का किला


चित्रदुर्ग किला 


Chitradurga Fort – चित्रदुर्ग किला जिसे चित्त्तलदूर्गकहा जाता है, जो कि कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में पहाड़ी और सपाट घाटी पर स्थित हैं। कन्नड़ भाषा में चित्रदुर्ग किले का अर्थ चित्रकारी किलाहै, चित्रदुर्ग शहर उसके प्रशासनिक जिले के नाम से जाना जाता है।

चित्रदुर्ग किला, कर्नाटक – Chitradurga Fort
ईस्वी 1500 से 1800 की शताब्दी के दौरान निर्मित इस किले को शासक चित्रदुर्ग, होयसाल, चालुक्य, विजयनगर साम्राज्य के कुछ सामंती स्वामी और राष्ट्रकूट के नायकों जैसे राजवंश शासकों द्वारा बनाया गया था। इस किले में कुल मिलाकर 18 मन्दिर है 
मदकर नायक के समय, हैदर अली ने किले में अपनी सेना को घेर लिया और नायक कबीले के अंतिम प्रतिनिधि पर जीत हासिल करने के बाद विजय प्राप्त की। हैदर अली ने वास्तव में इस किले पर तीन बार हमला किया और तीसरी बार 1779 में उसने सफलतापूर्वक विजय प्राप्त की। ऐसा कहा जाता है कि नायक ने लगभग 200 वर्षों तक इस किले पर शासन किया था।
चित्रदुर्ग किले का आर्किटेक्चर
   
     
       चित्रदुर्ग किले आश्चर्यजनक वास्तुकला है ऊपरी किले में 18 मन्दिर है जिनमें से गोपाला कृष्ण ,सुबराया , एकाननथ्म्मा ,भगवान हनुमान , फल्नेश्वर और सिधेश्वर है निचले किले में एक विशेष मन्दिर है जो देवी को समर्पित है इनमें से हिदिमेश्वरा मन्दिर सबसे पुराना मन्दिर है और वह सबसे दिलचस्प है चित्रदुर्ग किला महाभारत महाकाव्य के हिडिम्बा रक्षा की जगह भी माना जाता है यहां के प्रमुख मंदिर हैं जिनमें से गोपाल कृष्णानंदीसुबरायाएकाननाथम्माभगवान हनुमानफल्नेश्वरऔर सिद्देश्वर हैं।

यह किला कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में पहाड़ी और सपाट घाटी पर स्थित हैं। कन्नड़ भाषा में चित्रदुर्ग किले का अर्थ ‘चित्रकारी किला’ हैचित्रदुर्ग शहर उसके प्रशासनिक जिले के नाम से जाना जाता है। चित्रदुर्ग किला चित्रदुर्गहोयसालचालुक्यविजयनगर साम्राज्य के कुछ सामंती स्वामी और राष्ट्रकूट के नायकों जैसे राजवंश शासकों द्वारा बनाया गया था ।

         किले के ऊपरी हिस्से में 18 मंदिर हैंऔर निचले किले मे एक विशाल मंदिर भी हैं जो देवी को समर्पित है। किले में कई आक्रमण भी हुए है म्द्क्र नायक के समय हैदर अली ने किले में अपनी सेना को घर लिया था और नायक कबीले के अंतिम प्रतिनिधि पर अपनी जीत पाने के बाद विजय प्राप्त की हैदर अली ने इस किले पर तीन बार हमला किया था और तीसरी बार 1779 में सफलतापूर्वक विजय पा ली ऐसा कहा जाता है कि नायक ने लगभग 200 वर्षो तक इस किले पर शासन किया था 

        चित्रदुर्ग किला जिसे काल्लीना कोट ( स्टोन किला ) भी कहा जाता है , यह कर्नाटक का लोकप्रिय पर्यटन स्थल है इस किले का शानदार आर्किटेक्चर पर्यटकों को अपनी और आकर्षित करता है।

  

चित्रदुर्ग किले की यात्रा करने का सर्वोत्तम समय – Best Time to Visit Chitradurga Fort
आप इस किले का दौरा करने का सबसे अच्छा मौसम फरवरी, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर के महीनों में आराम से कर सकते है।
चित्रदुर्ग किले पर कैसे पहुंचे
सड़क की यात्रा  चित्रदुर्ग किले पर विभिन्न वाहन के जरिए पहुंचा जा सकता है। चित्रदुर्ग शहर पुणे-बैंगलोर राजमार्ग पर स्थित है। चित्रदुर्ग शहर तक पहुंचने के बाद किले के लिए टैक्सी या बस ले लो।
ट्रेन की यात्रा  शहर ट्रेनों के साथ बैंगलोर से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। वास्तव में चित्रदुर्ग का अपना छोटा रेलवे स्टेशन है।
हवाईजहाज की यात्रा  बंगलौर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा चित्रदुर्ग से 200 किलोमीटर दूर है।